काजल लागे कीरकीरे.||हमारे नसीब में थी ठोकरें ||कोई कितना भी हिम्मत वाला क्यों ना हो||झूठ बोला जा सकता है, ||अजीब सिलसिला था...



(1) काजल लागे कीरकीरे.

काजल लागे कीरकीरे.... और सुरमा सहा न जाय.. जिन नैनन में तुम बसे दूजा कोन समाये..! राग..

(2) हमारे नसीब में थी ठोकरें .

हमारे नसीब में थी ठोकरें ... श्याद इसीलिए तुम से मोहहबत हुई..!!"


(3) कोई कितना भी हिम्मत वाला क्यों ना हो,

कोई कितना भी हिम्मत वाला क्यों ना हो, किसी ख़ास इंसान की कमी रुला ही देती है। {


(4) झूठ बोला जा सकता है, 

झूठ बोला जा सकता है, लेकिन आँखों से छुपाया नहीं जा सकता।


(5) अजीब सिलसिला था...

अजीब सिलसिला था.... ....वो दोस्ती का साहिब..... जो कुछ दूर चला और ..... में ....इश्क में बदल गया ....

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